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Wednesday, June 1, 2011

80 वर्षीय ताऊजी .......गौशाला ..........दिल्ली की नौकरी ......स्वास्थ्य

       आज मै आपका परिचय अपने ताऊ जी से करवा रहा हूँ | ये हमारे बलोग जगत वाले ताऊ नहीं है इन्हें तो यह भी नहीं मालूम की ब्लॉग क्या होता है | लेकिन उनकी बहुत सी विशेषताओं पर मै प्रकाश डालूँगा | शायद आपके कुछ काम आ सके |

      हमारे दादा जी की सात सन्तान थी जिनमे पिताजी और ताऊ जी के रूप में दो लडके बाकी हमारी पांच बुआ जी | ताऊ जी दुसरे नंबर के है | इनका जन्म 1932 में हुआ था | उन्होंने हाई स्कूल गाँव के स्कूल से किया था | उस वक्त हाई स्कूल पास व्यक्ति कि बहुत कद्र की जाती थी | 1950 में वे भारतीय सेना में भर्ती हो गए | वंहा उन्होंने पांच साल काम किया उसके बाद परिवार वालो के दबाव में उन्होंने सेना की नौकरी छोड दिल्ली के संसद सचिवालय में नौकरी शुरू कि जिसमे बाबू की पोस्ट पर कार्य किया | वंहा पर विभिन्न विभागों में कार्य किया रिटायरमेंट के समय वे कपड़ा मंत्रालय में कार्य कर रहे थे | दिल्ली में नेताजी नगर के  बी ब्लॉक में रहते थे |

       आज उनकी उम्र अस्सी वर्ष के लगभग है लेकिन स्वास्थ्य उनका टकाटक है |घर से खेत की दूरी तीन किमी है वो भी बलुई मिट्टी वाला कच्चा रास्ता जिसपर चलने से आपकी दुगुनी ऊर्जा खर्च होती है | वे रोजाना दोनों समय खेत में जाते है वंहा अपना खेती बाडी का कार्य करते है| घर के समस्त कार्य स्वयं करते है | पानी भरना ,आटा  पिसवाना बाजार जाना ,इस प्रकार के समस्त कार्य हेतु वे किसी दुसरे पर निर्भर नहीं रहते है |

      उनकी दिनचर्या सुबह साढ़े चार बजे शुरू होती है | शौचादि के लिए भी वे दो किमी दूर खेत की तरफ जाते है जिससे उनकी सुबह की सैर भी हो जाती है |  सूर्य उदय के समय वे सूर्य नमस्कार व् अन्य योगा करते है | उसके बाद स्नान आदि करते है | एक घंटा भगवतगीता का पाठ करते है | उसके बाद भोजन करते है | भोजन भी ज्यादतर वे खुद बनाते है | या अपनी देख रेख में बनवाते है | आटा हमेसा मोटा पिसवाते है | उसे छलनी से छानने के बाद उसका निरक्षण किया जाता निरक्षण के बाद उस चोकर को वापस आटे  में डाल कर रोटी बनाई जाती है | भोजन भी बहुत सादा रहता है घी दूध दही आदी ही रहते है| दूध हमेशा गाय का ही लेते है भैस का दूध वे निकृष्ट समझते है  | सब्जी कम मसाले की होती है | दोपहर के आराम के बाद वे अपनी गौशाला की देख रेख करते है |

      उनकी गौशाला के बारे में हम हमेशा मजाक करते है | क्यों कि उन के पास जो भी गाय दूहने के लिए लाई जाती है वो ही थोड़े दिन बाद दूध देना बंद कर देती है | जिसका कारण उनका अपनी गायों के प्रती अगाध प्रेम है | उसे ज्यादा खिलाते पिलाते है और वो भी उतने  ही नखरे करती है | इस प्रकार उनके पास हमेशा ही चार पांच गाय रहती है | उनकी देख रेख वे स्वयम ही करते है |


ताऊ जी की गाये
आप चित्र में उनकी गायों को देख सकते है |

   





Tuesday, May 10, 2011

शेखावाटी का जन स्वास्थ्य और बकरी का धीणा

           आप सोच रहे होंगे कि जिस शब्द का मतलब हिन्दी भाषी लोग नहीं जानते उस शब्द का प्रयोग मैंने क्यों किया इसका कारण ये है कि ये शब्द यंहा शेखावाटी में बोलचाल में बहुत प्रयोग किया जाता है | धीणा शब्द का अर्थ है दुधारू पशुधन | बचपन में जब मै इधर उधर रिश्तेदारी में जाता था तब वंहा मुझसे कुछ कोमन से प्रश्न किये जाते थे जिनका क्रम इस प्रकार से रहता था | पहला सवाल बुजुर्गो के स्वास्थ का हालचाल से सम्बन्धित होता था दूसरा रोजी रोटी से सम्बंधित जैसे कि आपके पापाजी क्या करते है , आपके भाई साहब क्या काम धंधा करते है वगैरा वगैरा तीसरा सवाल उनका ये धीणा से सम्बंधित होता था कि दूध का सोर्स क्या है ? बच्चो की पढाई लिखाई के प्रश्नों का नम्बर बाद में आता था | आजकल वस्तु स्थिति में बदलाव आ गया है | पढाई लिखाई के सवाल पहले किये जाते है कौनसा बच्चा किस कक्षा में पढता है ये पहले जानना चाहते है |

             शेखावाटी में दूध हेतु गाय ,भैस ,बकरी का पालन किया जाता है | इनमे सबसे ज्यादा बकरी पालन किया जाता है | यंहा के गाँवों में बकरीयो की संख्या बहुत है | झुंझुनू ,नवलगढ ,मंडावा विधानसभा क्षेत्रो में बकरी पालन ज्यादा किया जाता है | अगर स्वास्थ्य की बात की जाए तो सबसे ज्यादा निरोगी व्यक्ति भी इन्ही क्षेत्रो के है | मै ने इन क्षेत्रो के स्वास्थ्य के अच्छे होने के कारण के बारे में काफी खोज बीन की तो पाया कि ये सब बकरी पालन की वजह से है | ग्राम  स्वरूप सिंह की तोगडा(त.नवल गढ़ )  में मेरी रिश्तेदारी है वंहा मेरा आना जाना रहता है |वंहा  के बारे में मैंने विश्लेषण किया तो पाया कि वंहा हर घर में बुजुर्गो कि आयु 80 साल से ऊपर है  | किसी को भी रक्तचाप ,मधुमेह ,ह्र्दय रोग संबंधी कोइ बीमारी नहीं है | उस गाँव का अभी तक का रिकार्ड है कि वंहा कोइ भी अकालमौत(जवान मौत ) किसी रोग कि वजह से नहीं हुई है समय से पहले यानी कि अकाल मौत एक दो अगर हुई है तो वो सुसाईड ,या एक्सीडेंट की वजह से ही हुई है | वंहा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी नहीं है एक बार एक कम्पाउन्डर साहब आये थे अपना धंधा जमाने के लिए लेकिन मरीजो के अभाव में वो भी थोड़े ही दिनों में चलते बने |  इस सब के पीछे कारण केवल बकरी का दूध पीना है | वंहा पूरे गाँव में भैस और गाय की संख्या नगण्य है | जबकि प्रत्येक घर में 8-10 बकरिया  है | कमोबेस बकरी पालन की यही स्थिति इस क्षेत्र के सभी गाँवो की है |


ये है हमारी बकरी और उसकेस्तनपान करते बच्चे 







नटखट बच्चे 

          
           बकरी का दूध बहुत गुणकारी होता है इस बात को दिल्ली एम्स के डॉक्टरों ने भी माना है | पिछले दिनों भास्कर में एक खबर आयी थी कि दिल्ली में डेंगू का जब प्रकोप हुआ तो वंहा बकरी का दूध चार सौ रूपये किलो में भी नहीं मिल पाया | मरीजो की रोगप्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि के लिए बकरी का दूध बहुत सहायक सिद्ध हुआ है जिसका कारण बकरी का जंगली वनस्पति का खान पान  होना और इसके दूध का सुपाच्य होना भी है | गांधी जी भी बकरी के दूध के सेवन पर जोर देते थे | बकरी का दूध केलोस्ट्रोल को कम करता है और ह्रदय को मजबूत बनाता है | स्मरण शक्ति को भी बढाता है 
अब मै आपको यह भी बता दू कि मै खुद भी बहुत बर्षो से बकरी का पालन कर रहा हूँ और इसके दूध का उपयोग कर रहा हूँ इस लिए मेरा स्वास्थ्य भी उपर वाले की मेहरवानी से अच्छा है |


Tuesday, December 28, 2010

बहुत उपयोगी है सहजन का पेड़-various use of drumstick tree

     सहजन का पेड़ भारत वर्ष में बहुतायत से पाया जाता है | इसके लिए ज्यादा ठण्ड नुकसान दायक है गर्मी कितनी भी हो झेल लेता है | बहुत दिनों से सोच रहा था इस पेड़ के बारे में लिखने के लिए लेकिन किसी न किसी कारण से ये पोस्ट लिखने का कायक्रम आगे खिसकता रहा |
सहजन का पेड़ फूल और फली के साथ

     सहजन का अंग्रेजी नाम ड्रमस्टिक,संस्कृत नाम सोभांजना, आयुर्वेद में मोक्षकाद्व और वानस्पतिक नाम मोरिंगा ओलीफेरा (moringa oleifera ) है | सहजन के बारे में काफी वैज्ञानिक खोजे हुई है | और बहुत से परिणाम भी निकाले गए है |
सहजन के बारे में कुछ निम्न तथ्य है :-

  • फिलीपीन्स, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में भी सहजन की काफ़ी माँग है।
  • दक्षिण भारतीय लोग इसके फूल, पत्ती का उपयोग विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में साल भर करते हैं।
  • इस पौधे के सभी भागों का उपयोग विभिन्न कार्यों में किया जाता है।
  • सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है और छाल पत्ती, गोंद, जड़ आदि से आयुर्वेदिक दवाएं तैयार की जाती हैं।
  • इसमें दूध की तुलना में ४ गुना कैल्शियम और दुगना प्रोटीन पाया जाता है।
  • सहजन के बीज से पानी को काफी हद तक शुद्ध करके पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।  
     ये तो थी तथ्यों की बात अब मै बताता हूँ इसका देशी स्टाइल में फायदा | मेरे घर में पांच छ साल से से इसका पेड़ है | इसका पेड़ लगाना बहुत ही आसान है | इसका पेड़ इतना आसानी से लग जाता है की आप को यकीन नहीं होगा की जिस झोपडी के बीम में इसकी लकड़ी का उपयोग किया जाता हो उसमे भी बगैर मिट्टी के ही पत्तियां फूट नि्कलती है | और यहां तक की एक पेड़ को मैंने एक जगह से दूसरी जगह स्थनांतरित भी किया था जिसका तना तकरीबन दो फुट परीधी का था और वजन लगभग आधा टन था | और उस तने को स्थान ना मिलने की वजह से तीन महीने तक धुप में बगैर पानी और मिट्टी के जमीन पर चित पडा रहा था | उस पर एक भी पत्ती नहीं थी | उस तने को जब तीन महीने बाद खड़ा कर मिट्टी में दबाया गया और पानी दिया तो उसमे भी अंकुरण हुआ और पेड़ फिर तैयार हो गया जिसे आप तस्वीर में देख सकते है |
हमारे घर मे सहजन का वो पेड़ जो स्थनांतरित किया हुआ है 

     अगर आपको मई के महीने में धूप से बचाव हेतु पेड़ चाहिए तो आप जनवरी में इसकी एक शाख जो तकरीबन दस फुट बड़ी हो का वृक्षारोपण कर सकते है तो ये तैयार होकर मई के महीने चारपाई डालकर सोने हेतु छाया दे देगी |कहने का अर्थ ये है की ये बहुत जल्दी विकास करता है |

     इसके फूलो की सब्जी मुझे बहुत पसंद है ,थोड़ा मेहनत वाला काम जरूर है लेकिन स्वाद एक बार जिसे लग जाए वो इसको जिन्दगी भर नहीं भूल सकता है | सब्जी बनाने की विधी -:
इसके फूलों को जो खिले ना हो उनको तोड़ लीजिए कडाही में तेल गर्म कीजिए उसमे प्याज अदरक लहसुन हरी मिर्च आदि भून लीजिये | उसमे सब्जी का मसाला यथा लाल मिर्च धनिया पाउडर हलदी,नमक आदि पानी के साथ मिक्स करके डाल देवे | जब मसाला पक जाए तब उसमे सहजन के फूल(कलियाँ) डाल देवे थोड़ा पानी और मिला देवे जो की पकने पर जल जाता है,अगर आप चाहे तो इसमें टमाटर भी डाल सकते है या फिर पकने के बाद थोड़ा टमाटर सॉस भी मिलाया जा सकता है | तीन मिनट बाद सब्जी को तैयार होने के बाद चूल्हे से उतार लेवे | आपकी लाजवाब सब्जी तैयार है | ये सब्जी जितनी स्वादिष्ट होती है उतनी ही गुणकारी भी होती है | इस सब्जी को बदहजमी वाले,मधुमेह वाले ,ह्रदय रोग के मरीज भी आराम से खा सकते है | इसकी फली की सब्जी भी इसी प्रकार से बनती है अंतर केवल इतना है की फली की सब्जी में पानी की मात्रा ज्यादा रखते है जिससे चावल के साथ भी खाया जा सकता है |
इन फूलों और  कलियों को सब्जी हेतु तोड़ा गया है 

     इसके फूल, फली व पत्तों में इतने पोषक तत्त्व हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) के मार्गदर्शन में दक्षिण अफ्रीका के कई देशों में कुपोषण पीडित लोगों के आहार के रूप में सहजन का प्रयोग करने की सलाह दी गई है। एक से तीन साल के बच्चों और गर्भवती व प्रसूता महिलाओं व वृद्धों के शारीरिक पोषण के लिए यह वरदान माना गया है। हमारे यंहा भी कैन्सर व पेट आदि शरीर के आभ्यान्तर में उत्पन्न गांठ, फोड़ा आदि में सहजन की जड़ का अजवाइन, हींग और सौंठ के साथ काढ़ा बनाकर पीने का प्रचलन है। यह भी पाया गया है कि यह काढ़ा साइटिका (पैरों में दर्द), जोड़ो में दर्द, लकवा, दमा, सूजन, पथरी आदि में लाभकारी है। जोड़ो का दर्द वायु विकार के कारण होता है | और सहजन वायु नाशक माना जाता है|सहजन के गोंद को जोड़ों के दर्द और शहद को दमा आदि रोगों में लाभदायक माना जाता है। आज भी ग्रामीणों की ऐसी मान्यता है कि सहजन के प्रयोग से विषाणु जनित रोग चेचक के होने का खतरा टल जाता है।

     अब आते है पानी साफ़ करने वाली बात पर | इस से पहले भी पानी के शुद्धीकरण के लिए मैंने एक पोस्ट लिखी थी | पानी के शुद्धीकरण के लिए ये उपाय भी आप आजमा सकते है | माइक्रोबायलोजी के करेंट प्रोटोकॉल में कम लागत में पानी को साफ करने की तकनीक प्रकाशित की गई है। यह तकनीक आसान और सस्ती है। इस तकनीक की मदद से विकासशील देशों में जल जनित रोगों से बड़े पैमाने पर होने वाली मौत की घटनाओं पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। इस तकनीक में पानी को साफ करने के लिए सहजन के बीज का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया के द्वारा पानी को 90.00 फीसदी से 99.99 फीसदी तक बैक्टीरिया रहित किया जा सकता है।

     सहजन दो प्रकार का पाया जाता है एक मीठा दूसरा कड़वा मीठे सहजन का ही उपयोग किया जाता है कडवे का उपयोग नहीं करते है | इस के बारे में कुछ और जानकारी चाहिए तो आप मुझे टिप्पणी द्वारा बताये या सीधे ही मेल करे |

चार लाख रु.लालच भी नहीं भुला सका मित्र की यादें-----ज्ञान दर्पण 

ताऊ पहेली 106 (हवा महल, जयपुर, राजस्थान)

सरसों की फसल और सर्दी परवान पर,    मालीगांव

श्री राजपूत करणी सेना के शीर्ष सस्‍थांपक व कांग्रेसी नेता लोकेन्‍द्र सिंह कालवी ने निशानेबाजी में स्वर्ण पदक जीता----राजपूतवर्ल्ड 

 

 

 

Monday, November 29, 2010

हाथ का दर्द और कम्प्यूटर पर बैठने की आदत........................नरेश सिंह राठौड़

     आप और हम सब लोग जो भी कम्प्यूटर के उपयोग कर्ता है उन्हें ज्यादा से ज्यादा समय कम्प्यूटर के सामने बैठ कर बिताना होता है | कम्प्यूटर हेतु बाकायदा आजकल उसके लिए निर्धारित टेबल का उपयोग किया जाता है | कई बार ये देखने में आया है की काम करने वालों के हाथ या कंधे में दर्द रहता है और वे अपने आप को असहज महसूस करते है | ये दर्द इतना बढ़ जाता है की वे कम्प्यूटर पर काम करने में भी असमर्थ रहते है |

     मेरे कहने का मतलब ये नहीं है की कम्प्यूटर पर काम करने से हाथ या कंधे में दर्द होता है | दर्द किसी भी वजह से हो सकता है लेकिन उस दर्द में स्थायित्व और वृद्धि कम्प्यूटर पर बैठने की गलत आदत की वजह से होती है | अब गलत आदत क्या है वो मै आपको बताता हूँ जिस पर आपने कभी ध्यान ही नहीं दिया होगा |

     आप जब कम्प्यूटर पर काम करते है तो आपकी कोहनी को सहारे की जरूरत होती है विशेषकर के दाहिने हाथ की कोहनी को जिससे की आप माऊस को आपरेट करते है | कम्प्यूटर की निर्धारित टेबल की साईज इतनी छोटी होती है की आप की कोहनी को सहारा मिलना लगभग नामुमकिन होता है | टेबल की चौडाई को देखे तो उस पर केवल आपका मोनिटर ही आ सकता है की बोर्ड और माऊस के लिए जगह उसके नीचे ही बनाई जाती है | उस परिस्थिति में आपकी कोहनी बगैर सहारे के ही रहती है | उससे उसकी मांस पेशियों में खिचाव बढ़ जाता है | जिससे दर्द बढ़ता है | जब कभी आपके कोहनी या कंधे में दर्द हो तो आप इस बात का जरूर ध्यान रखे की आपकी कोहनी को सहारा मिलता रहे और आपका हाथ कोहनी के पास ९० डिग्री का कोण बनाता हुआ रहे|

     पिछले कुछ दिनों से मेरे हाथ में किसी कारण से दर्द हो गया था जिसे ठीक होने में बहुत समय लग गया तकरीबन तीन महीने जैसा अब इन दिनों में मैने इस बात पर काफी चिंतन किया है वो सब मै आपको इस पोस्ट के जरिए ही बता रहा हूँ |
बैठने की सही स्थिति के लिए आप इस चित्र को देखे |
चित्र गूगल से सभार
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Saturday, September 4, 2010

पत्थरी के रोग में बहुत उपयोगी है गोखरू

मै आपको बता दू की आयुर्वेद से मुझे बचपन से ही लगाव रहा है| अब ब्लॉग के माध्यम से मै आपको इस ज्ञान की खुराक समय समय पर पिलाया करूंगा |

सबसे पहले आते है आजकल के आम रोग पथरी पर | यह रोग आजकल ज्यादा ही पैर पसार रहा है | इस रोग की संभावना उन लोगो में ज्यादा है जिन्हें बहुत कम पेशाब की हाजत होती है | इस रोग की दो अवस्था होती है प्रथम अवस्था में यह बहुत परेशान करता है जब मूत्राशय में पत्थर बनने शुरू हो जाते है | क्यों की ये पत्थर इधर उधर गतिमान होते रहते है जिससे रोगी के पेट में बहुत दर्द महसूस होता है | उसके बाद इनके आकार में वृद्धि हो जाती है और ये अपनी जगह बना लेते है और नलिकाओं में व्यवस्थित हो जाते है | उस के बाद दर्द बंद हो जाता है | रोगी सोचता है की वह ठीक हो गया है | लेकिन महीने दो महीने बाद जब उस स्टोन की साईज और ज्यादा बढ़ जाती है और पेशाब की नलीकाये अवरूद्ध हो जाती है तब दुबारा ज्यादा दर्द होना शुरू हो जाता है |

गोखरू का फूल 
पत्थरी की चिकित्सा में सबसे महत्वपूर्ण औषधी है गोखरू जिसे कई नामों से जाना जाता है | संस्कृत में गोक्षुर,बंगाली में गोखरी ,तेलगु में पालेरी कहते है | यह उत्तर भारत में बहुत ज्यादा पाया जाता है | यह दो तरह का होता एक पहाडी दूसरा देशी | औषधीय उपयोग में देशी गोखरू ही उपयोग में आता है |इसका फल कटीला होता है | फूल पीले रंग के होते है | पोधे की ऊँचाई अधिकतम 18 इंच तक होती है |

गोखरू का पौधा 
औषधी विक्रेता के पास इसके बीज मिलते है जिनका उपयोग आप कर सकते है |पत्थरी के रोगी को इसके बीजो का चूर्ण दिया जाता है तथा पत्तों का पानी बना के पिलाया जाता है |  इसके पत्तों को पानी में कुछ देर के लिए भिगो देते है | उसके बाद पतो को १५ बीस बार उसी पानी में डुबोते है और निकालते है इस प्रक्रिया में पानी चिकना गाढा लार युक्त हो जाता है | यह पानी रोगी को पिलाया जाता है स्वाद हेतु इसमे चीनी या नमक थोड़ी मात्रा में मिलाया जा सकता है | यह पानी स्त्रीयों में स्वेत प्रदर ,रक्त प्रदर पेशाब में जलन आदि रोगों की राम बाण औषधी  है | यह मूत्राशय में पडी हुयी पथरी को टुकड़ों में बाट कर पेशाब के रास्ते से बाहर निकाल देता है | अगर किसी प्रकार की कोइ शंका हो तो किसी अच्छे वैध से परामर्श लेवे |
गोखरू के बीज 













श्री गंगा नगर (राजस्थान) के बैंक कर्मी श्री अमित कुमार मित्तल
असिस्टेंट कमान्डेंट राज्यश्री राठौड़ :राजस्थान की पहली महिला पायलट
छोटी सी उमर

Monday, September 22, 2008

स्वास्थ्य सम्बन्धी कुछ नुस्खे

क्या आप कील मुंहासो से परेशान है? क्या आप खुजली व चर्म रोगों से परेशान है? आप सोच रहे होंगे कि मै किसी दवा कम्पनी का कोइ प्रोड्क्ट बेच रह हूं। जी नहीं मै यहां आपको स्वास्थ्य सम्बन्धी कुछ नुस्खे बताने जा रहा हूं
। * १-- यदि आपकी उम्र १४ से ३० वर्ष है तो आपको कील मुंहासो से परेशानी हो सकती है घबराइये मत नीचे लीखी बातों का ध्यान रखें । पहली बात तो यह है कि आप चेहरे की चिन्ता करना छोड. दे, रात्री को १० बजे से पहले सोयें । सुबह सुयोर्दय से पहले उठे ,कुल्ला करके भरपेट गुनगुना पानी पीयें। खाना खाने के बाद १ चम्मच त्रिफला चुर्ण गरम पानी या दूध के साथ लेवें। कब्ज यदि ज्यादा हो तो रात्री को सोते समय १चम्मच कायम चुर्ण(भावनगरवाले शेठ्ब्रदर्श का)लेवें। हरी पत्तेदार सब्जीयां व सलाद ज्यादा से ज्यादा भोजन में शामिल करें। केले,चावल,खिचडी,अनार आदी का परहेज करें तले हुये पदार्थ ज्यादा मात्रा में ना खायें। पपीता,सेव,चीकु,अमरूद,मूली आदि कासेवन करें। दूध में एक से चार चम्मच तक केस्टर आयल(अरन्डी का तेल) मिलाकर पियें । नोट:- ये सब आहारविहार,पथ्य कुपथ्य कइ रोगों में काम आतें है जैसे दाद,खाज,मस्सा(बावासीर) एवं वात रोग जैसे जोडो में दर्द ,पेटका आफरा(गैस)इत्यादि के भी यही नुस्खे हैं।






मैं जानता हूं कि ये सब आप पहले भी सुन चुके है अपने बुजुर्गोंसे लेकिन आपको उनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। मेरा दावा है कि एलोपैथी में चेहरे के कील मुंहासो की कोइ कारगर दवा अभी तक नहीं बनी है। मैं इस ब्लोग पर जो भी स्वास्थ्य सम्बन्धी बातें लिखता हूं वो सब मेरा निजीअनुभव है। *२--- कई बार पसीने की वजह से हमारे शरीर के कुछ हिस्सो मे खुजली हो जाती है, और पुरानी हो जाने पर तोआदमी को बन्दर बना देती है। यह खुजली ज्यादातर जांघ में होती है। इसे डोक्टरी भाषा में fungal infection(फंगल इनफेक्सन) कहा जाता है।शहरों की प्रदूषण और भागदोड. भरी जीन्दगी इसके लिये कुछ हद तक जिम्मेदार है। पसीने वाली जगह पर टेल्कम पाउडर डालकर इससे बचाव किया जा सकता है, इन्फेक्सन के बाद इसका इलाजआमतोर पर दाद या अन्य खुजली के रूप में किया जाता है जो कि गलत है। इसके इलाज के लिये आप को कुछदिन तक antibiotic tablet - fluconazole 150mg ,200mg जो भी उपलब्ध हो को दिन मे तीन बारलें व bayer कम्पनी की canesten ट्युब दिन में तीन बार लगावें। यदि infection नया है तो गोली लेनेकी जरूरत नहीं पडेगी केवल ट्युब से ही काम चल जायेगा अन्यथा infection गहराई में हो जाने पर tabletकी खुराक भी लेनी पडेगी।*३--- मस्सा(बावासीर) शुराआती स्टेज में हो तो आप यह प्रयोग कर सकते हैं, सुबह शाम हल्के गरम पानी में गुदाका सेक करें उसके बाद विक्स बाम अन्गुली पर ले कर गुदा द्वार पर लगायें। इससे नसों मे जो गांठे बन जाती है वो पिघल जाती है।मेरी अगली पोस्ट भूत प्रेत,अध्यात्म,व अलोकिक शक्तियों के बारे में होगी आप लोग जरूर पढें।