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Monday, March 28, 2011

ताऊ ताई का झगड़ा ....बचपन की फिसल पट्टी

     मेरा बचपन अपने छोटे से कस्बे(बगड ) में ही बीता है | बचपन से लेकर आजतक कस्बे में बहुत से बदलाव आ गए है | गांव के मध्य भाग में सूनापन बढ़ा है जबकि बाहरी हिस्से में लोग दूर दूर तक जंहा खेतीबाड़ी करते थे वंहा कोंक्रीट और सीमेंट के पेड़ लगा रहे है | पुराने मकान जिनमे सेठ साहूकार बूढ़े बुजुर्ग रहते थे आजकल उनके बच्चे उनमे रहना पसंद नहीं करते है | इसलिए वो या तो किरायेदारों के हवाले है या उनपर किसी भू माफिया ने कब्जा कर लिया या वो सुनसान पड़े अपना दर्द बयाँ कर रहे है | उन हवेलियों का सूना आँगन आज भी अपने मालिक की राह तक रहा है |
     मेरी स्कूल के रास्ते में ऐसा ही एक घर आता है जिसे देख मै अपने बचपन की रोचक घटनाओं को याद कर लेता हूँ | उस घर में बुजुर्ग दंपति रहते थे | सेठ जी का नाम शायद मालीराम खटोड था | मै जब भी उनके घर के पास से गुजरता था तो एक काम मै नित्य रूप से करता था उनके दरवाजे के पास की दिवार जो एक फिसल पट्टी के रूप में है उस पर बैठ कर फिसलने का आनंद लेता था| इसका चित्र आप नीचे देख रहे है | इस आनंद में मेरे बचपन के बहुत से दोस्त भी रहते थे |
ताऊ का घर

     उस आनंद को प्राप्त करने के बाद उसके प्रतिफल में माँ द्वारा प्रसाद भी मिलता था | वो रोजाना मेरी निकर देख कर समझ जाती थी की आज भी मैंने उस दीवार पर फिसलने का आनंद उठाया है और बदले मे वो हाथ उठाती थी | उस समय निकर ही पहनते थे पाचवीं कक्षा तक निकर का ही चलन था आजकल के बच्चे तो पैदाइशी जींस पेंट धारक होते है |
     कभी कभी वंहा पर बुजुर्ग ताऊ ताई का रूठना मनाना चलता था | रूठने का हक हमेशा ताई का ही रहता था | ताऊ बेचारा मनाता था मेरे स्कूल से लौटने के समय उनका दोपहर के भोजन का समय होता था ताई रूठ कर बाहर सीढीयों पर बैठ जाती थी | ताऊ खाना खाने के लिए उसकी मिन्नते करता था | ताऊ के कहे हुए शब्द आज भी मेरे मस्तिष्क पटल पर अंकित है | अरे भागवान खाना खा लो झगड़ा मुझसे है खाने से थोड़े ही है | तुम्हारी पसंद के गुलगुले(गुड और आटे द्वारा बनाए जाते है ) बनाए है |  ये संवाद आज  मेरी  वैवाहिक जिंदगी में भी कभी कभी बढ़िया काम करते है |

Sunday, February 20, 2011

जब मै भीख मांगता था

     शीर्षक देख कर चौकिये मत | ऐसा भी समय था जब मै भीख मांगता था | इस बात को बताते हुए मुझे पहले संकोच हुआ लेकिन आज बलोग जगत में सब अपने है किसी से बताते हुए क्या हिचकिचाना |

मांगन मरण सामान है मत मांगो भीख |
मांगन से मरना भला ये सदगुरू कि सीख ||
   
      ये सद्गुरुजी का आधा उपदेश है क्यों कि भीख मांगना हमेशा ही बुरी बात नहीं होती है कभी कभी भीख मांगना अच्छा कार्य भी माना जाता है |बात काफी पुरानी है शायद 1980 के आस पास की है | मै प्राथमिक स्कूल में पढता था | उस समय बच्चो के पास समय बिताने का तरीका या आमोद प्रमोद का तरीका भी थोड़ा अलग था | हम बच्चे, मोहल्ले भर के जानवरों पर विशेष कृपा दृष्टी रखते थे ,विशेषकर कुत्तों पर | मोहल्ले के कुत्तों को दुसरे मोहल्ले के कुत्तों से लड़वाने में भी मजा आता था खूब हूटिंग करते थे |

      इसी सिलसिले में जब कोइ कुतिया का प्रसव होता था तब मोहल्ले के बच्चे इकट्ठे होकर उस की सेवा करते थे |  उसके रहने खाने की व्यवस्था की जाती थी | सर्दी से बचाने का इंतजाम किया जाता था | इन सब कार्य हेतु जो सामग्री लगती थी उसके लिए हम भीख मांगते थे |

      ये भीख माँगना भी अलग तरह से होता था | एक कड़ाही का इंतजाम किया जाता उस कड़ाही को दो बच्चे दोनों तरफ से पकड़ते और साथ में पूरा दलबल रहता था हर घर पर जाकर पूरी लय और राग के साथ एक पध बोला जाता था| जो बोला जाता था वो मै भूल गया हूँ इसका सार ये था कि गृह मालिक को ये बताना कि मोहल्ले में कुतिया के प्रसव हेतु सामग्री जुटा रहे है | पध को सुनकर गृह मालिक अपनी क्षमतानुसार हमें भीख देता था | जिसमें आटा,तेल,गुड़,पुराना कपड़ा आदि होता था अगर कोइ दरियादिल होता तो नगद भी मिल जाता था|ये क्रम 10-15 रोज तक चलता था |

      आजकल पशुओं के प्रति प्रेम जन साधारण में कम हो गया है | बच्चों का बचपन उनके कैरियर कि चिंता में घुल गया है | आवारा कुत्ते भगवान भरोसे रह रहे है | काले कुत्तों की ख़ातिर तवज्जो फिर भी शनिवार को हो जाती है | बाकी बेचारे भगवान भरोसे है |