पिछले भाग ने आपने बख्तावरपुरा की कहानी के बारे में पढा इस भाग में आप इसकी सफाई व्यवस्था और पानी के प्रबन्धन के बारे में जानेंगे . इस गाँव में प्रत्येक गली में बारिस का पानी इकठा करने के लिए के लिए ७० फीट गहरे सोखते गढ्ढे बनाए गए है जिसमे गली मोहल्लो में बहने वाला बरसात का पानी इन सोखते गढ्ढो में भर जाता है और जमीन में पानी का जो स्तर गिरता जारहा था वो अब ऊपर आने लगा है इसी प्रकार घरो में जो व्यर्थ पानी बहता है उसके लिए भी चार पांच घरो के बीच में एक सोखती कुई का निर्माण कराया गया है इस प्रकार की कुयीयो की संख्या ७५ है | सभी गलीयो में कूडा पात्र रखा गया है | तकरीबन तीस कूडा पात्र रखे गए है | ६ टांके व आधुनिक सुविधाओं वाले ४५ सामुदायिक शोचालय बनाए गए है | गाँव की उपलब्धिया - नई तकनीक अपनाने पर इस गाँव को -
आदर्श ग्राम अवार्ड
स्वास्थ्य मित्र अवार्ड भामासा अवार्ड निर्मल ग्राम पुरूस्कार अवार्ड जलमित्र पुरूस्कारमिले है | १६ नवम्बर २००८ को सार्क प्रतीनिधिमंडल ने इस गाँव का अवलोकन कीया तथा सफाई व्यवस्था का जायजा लिया |
४ मई २००७ को अम्बेडकर स्टेडियम नयी दिल्ली में तत्कालीन राष्ट्रपती ए पी जे अब्दुल कलाम आजाद ने इस गाँव को निर्मल ग्राम पुरूस्कार दिया | इस पुरूस्कार को प्राप्त तो बहुत सी ग्राम पंचायतो ने किया है लेकिन बहुत ही कम ग्राम पंचायते है जहा इस सफाई व्यवस्था को बाद में भी कायम रख पायी हो | आज इस ग्राम की जो काया पलट हुयी है उसका सारा श्रेय यहाँ के सरपंच श्री महेंद्र जी कटेवा को है जिनकी अथक मेहनत व लगन से यह सब संभव हो पाया है | जब भी मीडिया वालो ने उनसे यह पूछा की इसका श्रेय आप किसे देते तो उन्होंने यह सब गाँव वालो की मेहनत का परीणाम बताया है | अब देश भर में जंहा भी सफाई व ग्रामीण विकास की कार्यशाला आयोजित की जाती वहा श्री महेंद्र जी कटेवा को बतौर वक्ता बुलाया जाता है |
काफी दिनों से कुछ अलग लिखने की कोशिश कर रहा था | लेकिन कुछ मसाला इन दिनों में नहीं सूझ रहा था | राजस्थानी में कहावत है की गोद में छोरा गांव में ढिंढोरा | सही कहा गया है | हमारे पास में ही एक गांव है , बख्तावरपुरा | यह गांव जिला मुख्यालय झुंझुनू से २० किमी तथा तहसील मुख्यालय से १० किमी दूरी पर है | इसकी स्थिति जयपुर पिलानी रोड पर होने की वजह से यातायात के साधन पर्याप्त है |
"बख्तावर" का फारसी में अर्थ होता है भाग्यशाली | खेतड़ी के राजा बख्तावर सिंह जी के नाम पर इसका नाम बख्तावरपुरा रखा गया था | यहां का मुख्य व्यवसाय खेती और पशुधन है | कुछ साल पहले गांव में जगह जगह कूड़े कचरे के ढेर लगे हुए थे | रास्तों में कीचड़ और पानी घुटनों तक भरा रहता था आम आदमी का वहा से गुजरना बहुत ही टेढा काम था | गन्दगी से मच्छर और मलेरिया का प्रकोप बना ही रहता था | लेकिन गांव में सेवा भावी व्यक्ति ( वर्तमान सरपंच ) श्री महेन्द्र जी कटेवा की दृढ़ इच्छा शक्ति व दूरदर्शी सोच के कारण आज हालात बदले हुए है | जब मै इस गांव मे पहुंचा तो मैंने पाया कि इसे गांव कहना ही गलत होगा । क्यों कि जन साधारण के मनो मस्तिष्क में तो गाँव कि तस्वीर में सुविधाओ को तरसते ग्रामिण और गन्दगी से अटे पड़े गलियारे ही होते है । पर यहाँ कि बात बिल्कुल उलट है
बस स्टैंड पर यात्रीयो के लिये बड़ा सा टिन शैड बना हुआ है । जिसमे बैठने के लिये कुर्सियो की, हवा के लिये पंखों की, पीने के पानी के लिये वाटर कूलर की , और सार्वजनिक शौचालयों कि व्यवस्था है । बस स्टैंड के पास ही ग्राम पंचायत का कार्यालय बना हुआ है । जिसे मिनि सचिवालय का नाम दिया गया है इसमें ग्राम सहायक, पटवारी, सरपंच आदि के पृथक पृथक कार्यालय बने हुये है । बाहर बड़ा बरामदा बना हुआ है जिसमे 10-15 कुर्सियां रखी गयी है । हवा के लिये पंखों कि सुविधा है । वहाँ आया हुआ अतिथि या ग्रामीण सुकून से आराम कर सकता है । यहाँ पर महीने में दो बार सभी सरकारी व गैर सरकारी लोगों की मीटिंग होती है जिसमे स्कूल के अध्यापक, अस्पताल के कर्मचारी ,ग्राम सेवक, पटवारी सरपंच व अन्य एन जी ओ वग़ैरा मौजूद रह कर ग्रामीण की समस्याओं का निदान करते है ।
( गांव का जल संग्रहण एंव जल कूप पुनर्भरण ( harvesting and water conservation plan आदि अन्य बाते अगले भाग मे )- _
अभी कुछ दिन पहले मोजिल्ला ने फायर फॉक्स को अपडेट किया था उसमे नए वर्ज़न Mozilla/5.0 (Windows; U; Windows NT 5.1; en-US; rv:1.9.1.2) Gecko/20090729 Firefox/3.5.2 GTB5 में हिंदी के स्पेल चेकर(हिन्दी वर्तनी जांचक )को अपनाने से इनकार कर दिया | अब आप तो जानते ही है की मेरे जैसे अनाड़ी आदमी को जिसने कभी भी हिन्दी सही नहीं लिखी हो उसे कितनी परेशानी हो सकती है | यह स्पेल चेकर भी पुराने समय में रवि रतलामी जी ने सुझाया था रवि जी का ब्लोगिंग में हिन्दी को तकनीकी रूप से विकसित करने में बहुत बड़ा योगदान है | जैसे ही यह समस्या मेरे सामने आयी मैंने दोबारा उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया | मेरी गुहार सुनकर उन्होंने फिर नया फार्मूला बताया | और कहा की इस प्रकार की परेशानी दूसरों को नहीं आये सो आप इस विषय पर एक पोस्ट ही लिख दो | अंधे को को क्या चाहिए दो आंखे | हमें तो पोस्ट लिखने का कोई न कोई बहाना चाहिए |
चित्र को बड़ी साइज में देखने के लिए उस पर चटका लगाए |
सबसे पहले आप फायर फॉक्स की नयी विंडो खोले URL की जगह लिखे about: config इसके बाद जो पेज खुले उसमे खाली जगह पर राइट क्लिक करे | new ->boolean -> boolean value ( इस खाने में लिखे extensions.checkCompatibility ) और ओके कर दे | इसके बाद आप लिस्ट में देखेंगे की extensions.checkCompatibility वाली लाइन में उसकी value जो true उसे आप fals में बदल दे इस पद्धति से आपके सभी एड ओन सुसंगत बन जायेंगे । जब भी एड ओन्स नए वर्ज़न के साथ काम नहीं करे तो आप इस फार्मूले को आज़माए यह सो प्रतिशत आज़माया हुआ है | अंग्रेजी में आप इस के बारे में यहाँ से पढ़ सकते है | अगर समझ मे नही आ रहा हो तो आप टिप्पणी/मेल् द्वारा भी पूछ सकते है । --
नीचे लिखे हुये दोहे राजस्थानी भाषा मे हैँ नीचे अंत मे कुछ कठिन शब्दों के
हिन्दी अर्थ भी दिये है फिर भी किसी पाठक को समझ मेनहीआयेतोवो टिप्पणीकेरूपमेयामेलद्वारापूछसकतेहै।
सूका सूका खेतडा पण नैणा मै बाढ ।
घर मँ कोनी बाजरी ऊपर सूँ दो साढ ॥
जद सूँ पाकी बाजरी काचर मोठ समेत ।
दिन भर नापै चाव सूँ पटवारी जी खेत ॥
फिर फिर आवै बादळी घिर घिर आवै मेह ।
सर सर करती पून मँ थर थर कांपै देह ॥
होगी सोळा साल री बेटी करै बणाव ।
कद निपजैली टीबडी कद मांडूला ब्याव ॥
टूटी फूटी झूँपडी बरसै गरजै गाज ।
इण चौमासै रामजी दोराँ रहसी लाज ॥
टाबर टीकर मोकळाँ करजै री भरमार ।
राम रूखाळी राखजै थाँ सरणै घरबार ॥
निरधनियाँ नै धन मिल्यो रोजणख्याँ नै राग ।
राम बता कद जागसी परदेसी रा भाग ॥
उगतो पिणघट ऊपराँ सुणतो मिठी बात ।
गळी गुवाडी घूमतो चान्दो सारी रात ॥
ना पिणघट ना बावडी ना कोयल ना छाँव ।
तो भी चोखो सहर सूँ म्हारो आधो गांव ॥
सांझ ढळ्याँ नित जांवता देखै सारो गांव ।
पिरमा थारी लाडली पटवारी रै ठांव ॥
पैली उठती गौरडी पाछै उठती भोर ।
झांझर कै ही नीरती सगळा डांगर ढोर ॥
छैल सहर सूँ बावडै खरचै धोबा धोब ।
पडै गांव मै रात दिन पटवारी सा रोब ॥
जद मन तरस्यो गांव नै जद जद हुयो अधीर ।
दूहा रै मिस मांडदी परदेसी री पीर ॥
प्रीत आपरी अचपळी घणी करै कुचमाद ।
सुपना मै सामी रवै जाग्या आवै याद ॥
पाती लिख रियो गांव नै अपरंच ओ समचार ।
दुख पावुँ परदेस मँ जीवूँ हूँ मन मार ॥
राग रंग नी आवडै कींकर उपजै तान ।
घर मै कोनी बाजरी अर टूट्योडी छान ॥
घर दे घर रूजगार दे घर घर री दे साख ।
ना देवै तो सांवरा जीवण पाछो राख ॥
बिन हरियाळी रूंखडा घरघूल्या सा ठांव ।
’राही’ दीखै दूर सूँ थारो आधो गांव ॥
लेग्या तो हा गांव सूँ कंचन देही राज ।
पाछी ल्याया सहर सूँ खांसी कब्जी खाज ॥
गाय चराती छोरडयाँ जोबन सूँ अणजाण ।
देख ओपरा जा लूकै कर जांटी री आण ।।
जोध जुवानी बेलड्याँ मिलसी करयाँ बणाव ।
आखडजै मत पावणा पगडंड्या रै गांव ॥
के तडपासी बादळी के कोयल री कूक ।
पैली ही सूँ काळजो हुयो पड्यो दो टूक ॥
अजब पीर परदेस री म मर जीवै जीव ।
घर मै तरसै गोरडी परदेसाँ मै पीव ।।
ना आंचळ ना घूंघटो ना हीवडै मै लाज ।
घिरसत पाळै गोरडी रोटी पोवै राज ॥
घाटै रो घर दे दिये दुख दीजै अणचींत ।
मतना दीजे सांवरा परदेसी री प्रीत ॥
धान महाजन रै घराँ ढोर बिक्या बे दाम ।
करज पुराणो बाप रो कीयाँ चुकै राम ॥
बेटो तो परदेस मै घर बूढा मा बाप ।
दोनो पीढी दो जघाँ दुख भोगै चुपचाप ॥
ठाला बिन रूजगार कै ताना देता लोग ।
भरी न अब तक गांव सूँ मनस्या बळण जोग ॥
जद जासी परदेस तूँ हुसी जद बरबाद ।
दरद दिसावर ई कडया रोज करैलो याद ॥
कितरा ही दुहा लिखूँ अकथ रहीज्या भाव ।
परदेसी रो दरद तो है गूंगै रो भाव ॥
कठिन राजस्थानी शब्दो के हिन्दी अर्थ :-
जठै - जहां
परपूठ = पीछे से
रूंखडा = पेड़
खळा = खलिहान
धोरा = टीला
बांखातर = उसके लिये
तज =त्याग
बिरथा = व्यर्थ
जूण = योनी
चौपड़= चौसर ( एक प्रकार का खेल )
ठीडै = जगह
ठुकरेश = राजपूती हेकडी
ठोडअरठांयचै = जगह ठिकाना
हिरण्यांऔरकीरत्यां = एक प्रकार के तारे जो रात्री में समय देखने के काम आते है
पाण्डियो =पंडित
जजमान = यजमान
* बेलिया -साथी
* बध बध - आगे आकर
* ओळमा - उलाहना
*बाँथ- आलिंगन
*पैली - एक
*सायना -हम उमर
*सेज़ाँ - शयन करने की जगह
*गौरडी - गणगौर जैसी नायिका
* गेल -पिछला
*परणेत - पत्नी
*बेली- साथी
*लोगडा - आम आदमी
*घूमन - फिरना
*बेलिया- साथिया
*पीसां - पैसे
*सगळा -सभी
*कग्यो - कह गया
*मांड्या - लिखना
*कंवळै - दीवार पर
*मैडी - ऊंचा स्थान
*दोरा सोरा - जैसे तैसे किसी कार्य को करना
*गैला - पागल
*लाजां - लज्जा
*चीरडा - चिथड़े
* रात्यूं - रात भर
*फाग - एक प्रकार की ओढ़नी जो फाल्गुन में राजस्थानी औरते पहनती है
*सून्पी- सौंप दिया
* र्रैँतां थका - होने के बावजूद
*सूगली - गंदी
*डूंगरी - पहाडी
*कैडो - कैसा
*जिण रो - जिस का पण - परंतु
कोनी- नही
सूँ- से
साढ- आषाढ (महिना)
मेह- बारिश
पून- हवा
सोळा- सोलह
निपजैली- पैदा होगी
टीबडी - छोटा खेत जिसमे एक छोटा टीला भी हो
मांडूला - शादी तय करूंगा
मोकळा - प्रयाप्त
करजै - कर्ज
रूखाळी - रखवाली
चान्दो - चन्द्र्मा ( नायक को दी गयी उपमा )
पिणघट - पनघट
ठांव - अड्डा
पिरमा- प्रेमा नाम का अपभ्रंश रूप
पीव - प्रेमी
घिरसत - गृहस्थी
घाटै - गरीबी
बिक्या- बिकना (विक्रय)
हुसी- होगा
जद- जब
अकथ- जो कहा न जा सके
सगळा - सब
नीरती - पशुधन को भोजन देना
डांगर ढोर - पशुधन
बावडै - वापिस आना
मिस- बहाना करना
मांडदी - लिख दी
अचपळी - नटखट
घणी - ज्यादा
कुचमाद - बदमाशी
रवै - रहना
जाग्या - जागना
आवै - आना
आवडै - पसन्द आना
कींकर - कैसे
छान - फूस की छत
घरघूल्या - घरौन्दे
पाछी - वापस
लेग्या- लेकर जाना
ओपरा - पराया
लूकै - छिपना
जांटी - खेजडी ( राजस्थानी वृक्ष )
आण - ओट मे , सोगन्ध
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हम सभी के लिये बहुत खुशी की बात है कि हमारे देश द्वारा निर्मित बहुत प्रतीक्षित सॉफ्टवेयर भुवन अब जारी हो गया है इसके बारे मे कहा गया था कि यह गूगलअर्थ से भी एक कदम आगे होगा । क्यो की इसमे जो फोटोग्राफ्स काम में लिए गए है वो नए है | गूगल एक ऐसी कम्पनी है जिसे टक्कर देना काफी चुनौती पूर्ण काम है । भुवन के लाँच होने के बाद हम लोग अपने देश व अपने लोगों पर गर्व कर सकते है । इसको बनाने का सारा श्रेय इसरो( भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र ) को है इसका सॉफ्टवेयर एक विदेशी कम्पनी ने बनाया है ।
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भुवन की एक विशेषता यह भी बताई गयी है कि यह गूगल अर्थ से भी ज्यादा साफ व स्पष्ट तस्वीरे दिखायेगा । यह बात बीटा वर्ज़न मे सही नही है ।
मैं ने इसे चला कर देखा है । इसका एक प्लग इन डाउन लोड करना पड़ता है जिसे आप इसकी साइट से रजिस्टर होने के बाद फ्री मे प्राप्त कर सकते है । आप स्क्रीन शॉट देख कर खुद ही समझ जायेंगे । हा एक बात और बता दू यह मोजिला फायर फॉक्स मे काम नही करता है इसे इंटर नेट एक्सप्लोरर मे ही चलाना पड़ता है । बीटा वर्ज़न मे है इस लिये यह बहुत धीमे चलता है । अभी इसमे डाटा बेस छोटा होने की वजह से प्लेस मारकिंग भी बहुत कम है । तस्वीरे स्पष्ट नही है केवल कोई पहाड़ी वगैरह ही ज्यादा स्पष्ट दिखायी देती है । अभी शैशव अवस्था मे है इस लिये यह गूगल अर्थ से पीछे है लेकिन आने वाले समय मे हो सकता है इसमे सुधार हो और यह गूगल अर्थ से भी आगे निकल जाये |
नीचे लिखे हुये दोहे राजस्थानी भाषा मे हैँ नीचे अंत मे कुछ कठिन शब्दों के
हिन्दी अर्थ भी दिये है फिर भी किसी पठक को समझ मेनहीआयेतोवो टिप्पणीकेरूपमेयामेलद्वारापूछसकतेहै।
कीडी नगरो सहर है मोटर बंगला कार ।
जठै जमारो बेच कै मिनख करै रूजगार ॥
अजब रीत परदेस री एक सांच सौ झूँठ ।
हँस बतळावै सामनै घात करै पर पूठ ॥
खेत खळा अर रूंखडा बै धोरा बै ऊंट ।
बाँ खातर परदेस के तज देवूँ बैकूँट ॥
देह मशीना मै गळै आयो मौसम जेठ ।
बिरथा खोयी जूण म्हे परदेसा मँ बैठ ।।
ऊमस महीना जेठ रो बो पीपळ रो गांव ।
संगळियाँ संग खेलता चोपङ ठंडी छाव ॥
गाता गीत न गा सक्या करता करया न कार ।
जीतै जी ना जी सक्या मरिया पडसी पार ॥
ठीडै ठाकर ठेस रा ठीडै ही ठुकरेस ।
बिना ठौड अर ठाईचै क्यूँ भटकै परदेस ॥
समरथ जाणु लेखणी सांचो जाणू रोग ।
गावैला जद चाव सूँ दरद दिसावर लोग ।।
सूना सा दिन रात है सूनी सूनी सांझ ।
बंस बध्यो है पीर रो खुशिया रै गी बांझ ।।
हिरण्याँ हर ले नीन्द नै किरत्याँ कैदे बात ।
तारा गिणता काटदे नित परदेसी रात ॥
रिमझिम बरसै भादवो झरणा री झणकार ।
परदेसी रै आन्गणै रूत लागी बेकार ॥
साखीणो संसार है कद तक राखा साख ।
साख राखताँ गांव मँ मिटगी खुद री साख ॥
तन री मौज मजूर हा मन री मौज फकीर ।
दोनूँ बाताँ रो कठै परदेसाँ मँ सीर ॥
ऊंचा ऊंचा माळिया ऊची ऊंची छांव ।
महला सूँ चोखो सदा झूंपडियाँ रो गांव ॥
बाट जोंवता जोंवता मन हुग्यो बैसाख ।
छोड प्रीत री आस नै प्रीत रमाली राख ॥
जद सूँ छोड्यो गांव नै हिवडै पडी कुबाण ।
गीत प्रीत री याद मँ आवै नित मौकाण ॥
प्रीत आपरी सायनी होगी म्हारै गैल ।
भारी पडज्या गांव नै जिया कंगलौ छैल॥
प्रीत करी नादान सूँ हुयो घणो नुकसान ।
आप डूबतो पांडियो ले डूब्यो जुजमान ॥
हेत कामयो देश मँ परदेसा मँ दाम ।
किण री पूजा मै करू गूगो बडो क राम ॥
बाबो मरगो काळ मै करग्यो बारा बाट ।
घर मँ टाबर मौकळा कै करजै रो ठाठ ॥
मारै आह गरीब री करदे मटिया मेट ।
पण कंजूसी सेठ रो रति ना सूकै पेट ॥
किण नै देवाँ ओळमाँ किण नै कैँवा बात ।
टाबरियाँ रै पेट पर राम मार दी लात ॥
कठिन राजस्थानी शब्दो के हिन्दी अर्थ :-
जठै - जहां ,
परपूठ = पीछे से ,
रूंखडा = पेड़ ,
खळा = खलिहान ,
धोरा = टीला ,
बांखातर = उसके लिये,
तज =त्याग ,
बिरथा = व्यर्थ ,
जूण = योनी,
चौपड़= चौसर ( एक प्रकार का खेल ) ,
ठीडै = जगह ,
ठुकरेश = राजपूती हेकडी ,
ठोडअरठांयचै = जगह ठिकाना ,
हिरण्यांऔरकीरत्यां = एक प्रकार के तारे जो रात्री में समय देखने के काम आते है ,
बलोग जगत के सितारे ताऊरामपुरिया जी ने एक इसप्रकारकीपोस्ट लिखी की मुझे भी इस श्रृखंला को आगे बढ़ाने की चाहत पैदा हो गयी | रही सही कसर श्रीरतनसिंहजी ने पूरी कर दी उन्होंने भी यह गीत सुनने की इच्छा जाहिर की | मेरे पास यह गीत उपलब्ध तो नही था लेकिन थोड़ा इधर उधर खंगालने पर आख़िर यू ट्यूब पर यह गीत मिल ही गया | तो आप भी इस गीत का आनन्द ले |,और इसके अपलोडर को धन्यवाद दे |
गुजरात का नाम लेते ही आँखों में गांधी जी की तस्वीर और में नरेन्द्र मोदी की शख़्सियत घूमने लगती है| लेकिन यह जो जहरीली शराब काण्ड है, उससे गुजरात की एक अलग तस्वीर उभर कर सामने आयी है | जहा बहुत सालो से ड्राई ज़ोन घोषित कीया हुआ था वहा इतनी मात्रा में शराब पकड़े जाने से समूचा देश इस ख़बर से हैरत में है |
मै पहले कुछ समय गुजरात के सूरत शहर में रह चुका हूँ इस लिए वहा की स्थानीय सामाजिक स्थितियों से अच्छी तरह से वाकिफ हूँ | कहने को वहा शराब बंदी है लेकिन शाम के समय अगर आप मजदूरों की बस्ती में जाकर देखे तो केवल दो तीन चीजों के अच्छे खासे व्यापारी मिल जायेंगे | जैसे शराब गोस्त आदि सड़क के दोनों किनारों पर २० लीटर की जरीकेन भरी हुई रखते है ,कुछ विक्रेता पाउच में भरी हुई बेचते है | यह सब चलता है प्रशासन की देखरेख में और प्रशासन की नाक के नीचे | पुरानी जगह जहा मै काम करता था वहा आफिस का एक साथी था । उससे थोड़ी घनिष्ठता हो गयी थी । उसने मुझे बताया कि वह भी अपने परिवार के साथ शराब के धन्धे मे काफी दिनों से लगा हुआ है । जब मै एक दिन उसके घर उससे मिलने गया तो वहा का वातावरण जैसा कि मैने ऊपर बताया हुआ है ठीक वैसा हे मैने पाया । उसके घर के बाहर मैने एक पोलिस के डंडे को खड़ा किया हुआ देखा जब उस दोस्त से इसका कारण पूछा तो उसने मुझे बताया कि इसे देख कर पुलिस वाले दूर से ही समझ जाते है कि यहाँ का हफ्ता पुलिस स्टेशन मे पहुच रहा है । इस लिये वो ज्यादा तंग नही करते है नये पुलिस वाले को जब पता नही रहता है तो वह केवल इतना कोड वर्ड मे पूछना है कि " आ डण्डो कैया साहेब नो छे " मतलब कि यह डण्डा किस साहब का है जवाब मे जिस साहब को हफ्ता दिया जाता है उसका नाम बता देने पर वह वहा से चला जाता है । यह है गुजरात की परिपाटी जो शराब माफिया द्वारा चलायी जाती है।
पिछली पोस्ट में श्रीरतनसिंहजी ने व अन्य ब्लोगर मित्रो ने आग्रह किया की दरददिसावर के औ र भी कुछ दोहे पढ़वाए मै ने भी सोचा की पूरी किताब को ही डाल दिया जाए | पेश है आपकी नजर दरद दिसावरके दोहे | नीचे लिखे हुये दोहे राजस्थानी भाषा मे हैँ नीचे अंत मे कुछ कठिन शब्दों के हिन्दी अर्थ भी दिये है फिर भी किसी पठक को समझ मे नही आये तो वो टिप्पणी के रूप मे या मेल द्वारा पूछ सकते है ।
इस बार मानसून की देरी से सभी चिंतित हो गए है | इस समय की वर्तमान परिस्थितियों पर लोग बाग़ आपस में बातें करते रहते है मेरी दूकान पर भी इस प्रकार की चर्चा चलना आम बात है इन्ही चर्चाओ के बीच में एक कहानी मुझे एक ताऊ ने सुनायी जो इस प्रकार है | पुराने समय में एक गाँव में पंडित ताऊ रहता था | ताऊ की कोई औलाद वगैरा नही थी मतलब की घर में ताऊ और ताई मात्र दो प्राणी ही थे | मानसून आने वाला था ताऊ को खेत देखने जाना था ताऊ ने आसमान की तरफ देखा और बादलों को देख कर विचार किया की बारिश कभी भी आ सकती है | इस लिए ताऊ ने साथ में छाता ले जाना उचित समझा | ताऊ बंद छाते को लेकर चल दिया | खेत में पहुँच गया और थोड़ी देर घूम घाम कर छाया में सुस्ता कर वापसी चल दिया | ताऊ ने घर पहुँच कर अपनी छतरी को दीवार के पास उलटा खड़ा कर दिया यानी की हत्थे वाला भाग अब नीचे की तरफ़ हो गया था | पहले छाते को हत्थे से पकड कर ताऊ मजे से खेत में जाकर आया था लेकिन घर आकर उसने छाते को दीवार के सहारे उलटा खड़ा कीया जैसे ही उसने छाता नीचे की और किया उसमे से एक काला सांप निकल कर भागा और ताऊ तुंरत पीछे खिसक गया | ताई यह देख कर दंग रह गयी उसके मुह से बरबस ही निकल पडा "योतोबरस्योकोनीबरस्यापडतोकाळ| बिनबर्ष्यासमोहुयोतूठ्योदींन दयाल ||" इसका अर्थ है कि अच्छा हुआ जो बारीश हुई नही अगर बारीश होती तो ताऊ उस छाते को रास्ते मे खोलता ओर सांप डस जाता ताऊ के मरने से ताई के लिये अकाल जैसे हालात बन जाते इस लिये उसके लिये तो बिना बारीश के समो ( ज्यादा पैदावार ) हो गया और भगवान की कृपा हो गयी ।
शेखावाटी के बगड़ कस्बे मे पैदा हुये कवि श्री भागीरथ सिंह ‘भाग्य’ राजस्थानी भाषा के अग्रणी कवियों मे से एक हैं। इन्होने राजस्थानी भाषा मे अनेक कविता संग्रह लिखे है । जिसमें से एक कविता संग्रह दर्ददिसावर के संकलित अंश मै यहाँ पेश कर रहा हू ।
यह कविता संग्रह उन्होने तब लिखा था जब वे कुछ समय नोकरी के सिलसिले मे बाहर गये थे । बाहर कमाने के लिये गये हुये कवि के मन कि कसक और व्यथा का उन्होने सजीव और मार्मिक चित्रण किया है । म्हारी बात नामक शीर्षक मे उन्हीं के शबदो मे
“ दिसावररीहांफलाभरतीजिंगाणी भीड़...... भीड़...... भीड़...... भीड़मायचिथ्योडीखुदरीछायानैबचावतोम्हारोमन जदकईकईदिनातकम्हारेकनेनहीहुतो उणवखत बसऐदूहाहीसंगीसाथीहा।