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Wednesday, July 15, 2009

बिणजारी ऐ हंस हंस बोल बाता थारी रह ज्यासी

बलोग जगत के सितारे ताऊ राम पुरिया जी ने एक इस प्रकार की पोस्ट लिखी की मुझे भी इस श्रृखंला को आगे बढ़ाने की चाहत पैदा हो गयी | रही सही कसर श्री रतन सिंह जी ने पूरी कर दी उन्होंने भी यह गीत सुनने की इच्छा जाहिर की | मेरे पास यह गीत उपलब्ध तो नही था लेकिन थोड़ा इधर उधर खंगालने पर आख़िर यू ट्यूब पर यह गीत मिल ही गया | तो आप भी इस गीत का आनन्द ले |,और इसके अपलोडर को धन्यवाद दे |



10 comments:

  1. भाई आपने यह बहुत बढिया काम किया है. आपको वहां पर अगर इसकी सीडी मिल जाये तो मुझे अवश्य भिजवाईयेगा. हमारे गांव के पास एक नाथों की ढणी थी, वहां से अर्जन नाथ और बोदूनाथ नामके दो भाई हमारे गांव मे अपना इकतारा लेकर आया करते थे. एक भाई का इस पर नाचना और दुसरे का गाना..बस ये समझ लिजिये कि इससे बडा कोई संगीत नही सुना. अब वहां जाना नही होता..तो कोशीश किजियेगा की आपके गांव के आसपास ही कोई मिल जाये तो आप इसे रिकाड अव्श्य कर लिजियेगा.

    रामराम.

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  2. यह संगीत ढूंढने व प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद ! दरअसल मुझे पता था यह गीत नेट पर नहीं भी होता तो बगड़ या चिडावा में केसेट की दुकान पर इसकी सी डी आपको अवस्य मिल जाती | गांवों में घुमने वाले भोपा भोपी भी इस गीत को बहुत बढ़िया गाते है कभी मौका लगे तो रिकोर्ड कर लेना | मैंने तो यह गीत http://convert.playtube.com/ वेब साईट की मदद से एम् पी थ्री फोर्मेट में डाउनलोड कर लिया है | भगीरथ जी के दोहे जब भी पढो हर बार नया मजा आता है |

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  3. bahut sundr geet hai ,prastut krne ke liye dhnyavaad.

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  4. इस गीत को mp3 फोर्मेट में डाउनलोड करने के लिए इस लिंक पर जाएँ
    http://www.quickfilepost.com/download.do?get=13ca172ea3c03baa2bd2c55245a37bd5

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  5. राठोर साहब बहुत अच्छा लगा कुछ कुछ समझ मै आता है, लेकिन भाषा अपनी सी लगती है.
    धन्यवाद

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  6. बहुत खूब.. बचपन से यह गीत कानों में पड़ता रहा, लेकिन भागमभाग की जिंदगी में जैसे कहीं खो गया.. आपने एक बार फिर इसे जीवंत कर पेश किया.. आभार

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  7. हाँ जी वाक़ै यह बढ़िया रहा

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  8. बिणजारे की यह घटना मुझे सम्‍मोहित करती रही है। मेरा मन था कि जब मैं बिणजारे एवं कुते की समाधि की फोटो खिंचूगा तब ही साहित्‍यकार श्री श्ंकरलाल झिखनाडिया द्वारा लिखी गई इस घटना का जिक्र करूंगा। बहुत पुरानी बात है, एक बिणजारे की बाळद चूरू में आई एवं चूरू शहर के पींजरापोल मार्ग पर खुली जगह देखकर अपणो डेरो जमायो। अपनी बिणद अर्थात व्‍यापार प्रयोजन हेतु बिणजारे को रकम अर्थात धन की आवश्‍यकता हुई। इसी कारण वह चूरू शहर के एक महाजन के पास रकम उधार लेने हेतु गया। सेठ पूर्व से ही बिणजारे काे एवं उसकी इमानदारी से परिचित था। महाजन ने बिणजारे से कहा कि रकम तो तूं चाहे जितनी लेजा पर मेरा एक उसूल है कि मैं बिना कोई वस्‍तु अडाण रखे रकम ना देउं। सेठ री बात सुनकर बिणजारो बाेल्‍यो सेठां मेरे पास मेरो ओ कुतो है आप इन अडाण राख ल्‍यो, रकम चुकता करन के बाद मैं म्‍हार कुत न ले ज्‍यास्‍यूं। सेठ कुत न राख लियो और बिणजारे न रकम गिण क दे दी। विधाता को लेख तो देखो बी रात ही चोरां सेठ की हेळी मांय चोरी करी। चोर चार जणां हा। कुतो चोरां न चोरी करतो चुपचाप देखतो रहयो । जद चोर सोनो चांदी रोकडा लेर चाल्‍या और कुतो बांक गेळ होग्‍यो आग चाळ कर शहर से बाहर एक तालाब में चाेरी की गठरी गेर दी और चले गये। कुते ने दूर से ही चोरी की इस घटना को देख लिया और सुबह चोरी का पता चलने पर आसपास के लोग एकत्रित होने लगे। कुते ने जल्‍दी जल्‍दी सेठ की धोती खींचनी आरम्‍भ कर दी और विचलित सा हो कभी अन्‍दर जाये और कभी बाहर आने लगा। एक व्‍यक्ति ने कहा कि बिणजारे का कुता स्‍याणा हाेवे इसके लारे लारे चलणा चाहिये। कुता आगे चलने लगा और करीब दस एक व्‍यक्ति उसके पिछे चलने लगे। कुता उस तालाब के पास जाकर ठहर गया और तालाब के पानी में कुद गया और चोरी की गई गठरी बाहर निकाल लाया। इस पर सेठ कुते पर बहुत खुश हुआ क्‍यों कि उसे चोरी का समस्‍त सामान वापिस मिल गया। सेठ ने बिणजारे के नाम एक पत्र लिखा जिसमें यक उल्‍लेख किया कि ''म्‍हारा रिपिया सूद सहित म्‍हे ले लियां हां। अब में थारे कुते ने छोडूं हूं। '' यह लिख कर पत्र कुते के गले में डोरी डाळ कर बांध दिया और कुते को कहा कि अब बिणजारे के पास चले जाओ। कुतो सीधो सीधो भागतो बिणजारे के डेरे पर गया। कुते को आता देख बिणजारा मन मन ही मन बोला '' ओ तो सेठ ने धोखो देर आयो है'' और बिणजारे ने कुते को गोली मार दी। कुता ने मौके पर ही प्राण त्‍याग दिये। कुते के गले में पत्र देख कर एवं पढ कर बिणजारे को बहुत पछतावा हुआ जिसका परिणाम बिणजारे ने खुद को ही गोली मार ली। चित्र में ये दोनों समाधियां जिनमे से एक कुते की है एवं दूसरी बिणजारे की है। जो आज भी मौजूद है।

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