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Wednesday 5 May 2010

गलोबल वार्मिंग की चपेट में आयी शेखावटी की ओरगेनिक सब्जीया

आजकल वातावरण में जो तेजी से बदलाव आ रहा है | उसका मानव जीवन पर भी असर पड रहा है | पिछले हफ्ते मै अपने खेत पर गया था | आप तो जानते ही है की यहाँ शेखावाटी के अन्य लोगो की तरह मै भी ऑर्गेनिक सब्जी का बड़ा शौकीन हूँ | इस मौसम में इस वर्ग की दो सब्जी यहाँ मिलती है एक खेजडी( रेगिस्तानी पेड़)की फली जिसे सांगर या  सांगरी  कहा जाता है | दूसरी सब्जी है कैर (टींट) | इन दोनों सब्जियों की  इस मौसम में बहुतायत से उपलब्धता होती है |

मार्च के महीने में खींपोळी की पैदावार होती है जो इस बार कम ही रही थी | पिछले साल इसके बारे में मैंने लिखा था तो काफी लोगो ने इसके बारे में जानकारी मांगी | बहुत से विदेशी लोगो ने ( इजराइली ) तो इसके बीज की मांग भी की थी | मै आपको बता रहा था कि पिछले हफ्ते मै खेत में गया था | अपनी बकरी को साथ लेकर के ( आश्चर्य मत कीजिये मै एक बकरी भी रखता हूँ ) और अपना सहायक टूल को लेकर जो बड़े से बांस का बना हुआ है | राजस्थान के लोग जानते है कि इसका उपयोग भेड बकरी पालन करने वाले ऊँचे पेड की टहनी वगैरा अपने पशुओ को खिलाने हेतु इसका उपयोग करते है |

मै गया था बहुत आशा लेकर के लेकिन वहा जा के पेड़ों की हालत देखकर भविष्य की भयावहता का अंदाजा लग गया | पर्यावरण को लेकर पर्यावरणविदों की चिंता बहुत ही जायज़ है | आज शहर में रहकर कूलर ए सी में दिन बिताने वालो को ग्लोबल वार्मिंग का डर शायद अभी नहीं सताएगा लेकिन ग्रामीणों को अभी से अंदाजा लगने लग गया है, कि आने वाले पांच दस वर्षों में क्या बदलाव आने वाला है |

पेड पर झुलसी हुयी सांगरी
आप भी फोटो को देख कर अंदाजा लगा सकते है | पिछले पन्द्रह रोज के तापमान पर आप नजर डालें तो आपको पता चलेगा कि इस वर्ष गर्मी की शुरूआत में ही आम जन ऊंचे तापमान से त्रस्त हो उठा था | यही दौर था जब इन पेडों पर फूल व फली लगने का समय होता है | ये फूल व फली इस समय के ऊँचे तापमान को सहन नहीं कर पाए और इनका विकास जहा का तन्हा रुक गया | जिस पेड पर पांच फली लगी वहा छठी की गुंजाइश ही नहीं रही वो पांच ही झुलसकर लकड़ी में परिवर्तित हो गयी | फूल फली बने बगैर ही पेड पर से झड़ गए |मुझे आध किलो सब्जी के लिए तीन चार किमी तक घूमना पड़ा तब कही एक समय की सब्जी का जुगाड हुआ है |

वैसे रेगिस्तान के पेड पौधे ऊँचे तापमान को सहने के लिए जाने जाते है लेकिन कितना ऊंचा उसकी कोइ सीमा तो है | अब वो सीमा भी प्रकृति लांघ गयी है | हर वर्ष 20 से 25 अप्रैल के मध्य तापमान 30 से 35 डिग्री सैंटिग्रेड रहता है वही इस समय दौरान यहां का तापमान 45 डिग्री सैंटिग्रेड तक पहुँच गया | और जब 45 डिग्री हमेशा रहता है यानी की मई के शुरआती हफ्ते में तो आजकल 37 डिग्री से ऊपर नहीं जा रहा है | हो सकता है आज कल में बारिश व ओले भी गिरने लगे | और जब सावन भादों आएगा तब आंधिया व लू के थपेड़े चलेंगे | इसी का नाम तो है ग्लोबल वार्मिंग |.

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12 टिप्पणियाँ:

  1. ग्लोबल वार्मिंग के कारण सांगरी भी बळगी।
    ओ तो काम कमाल को ही होयगो।

    अरे भाई गर्मी घणी बढ़गी।

    राम राम

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  2. बात आपकी सही है. जिस क्रुरता से जंगल काटे गये हैं, उसका परिणाम भुगतने के लिये तो तैयार रहना ही होगा.

    रामराम.

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  3. आप से सहमत है जी, लेकिन इंसान अभी भी नही समभला, अभी भी वक्त है... वर्ना आने वाली नस्ल का क्या होगा?

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  4. इस बार गर्मी वाकई में हर सीमा लांघ गई है. पता नहीं मई अंत में क्या होगा.

    दो शाक पदार्थों के बारे में पहली बार जाना. अच्छा लगा.


    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.IndianCoins.Org

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  5. गर्मी से झुलसते हम और हमारे खाद्य ।

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  6. ग्लोबल वार्मिंग का असर तो देर सवेर पड़ना ही है | हमारे खेतों में तो पता नहीं क्यों हर साल खेजड़ी के पेड़ सूख रहे है सूखे पेड़ की जब जड़ निकालते है तब उसमे बड़े बड़े कीड़े लगे मिलते है यही हाल रहा तो खेजड़ी के पेड़ कुछ ही वर्षों में गायब ही हो जायेंगे और रह जायेंगे सिर्फ बबूल के पेड़ |

    सांगरी और केर तो राजस्थान के मेवे है यही नहीं बचेंगे तो हम तो कंगाल ही हुए समझो |

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  7. राम राम जी नरेश जी...
    अजी ऐसा होने का तो पहले ही भान था पर इतना जल्दी हो जाएगा, सोचा नहीं था !
    अपने इस वातावरण के लिए न तो किसी के पास वक़्त है और कुछ ये सोचते हैं की मैं अकेला क्या कर लूँगा और वो भी इस भीड़ का हिस्सा बन जाता है :P
    अपने बड़े बुजुर्गों ने खेती किसानी में बहुत ही ध्यान रखा था यहाँ तक की वो रासायनिक खाद को भी उपयोग में नहीं लेते थे बल्कि गोबर खाद का इस्तेमाल करते थे !
    प्लास्टिक की खोज तो सबसे बड़ा कारण है इस ग्लोबल वार्मिंग का !
    अब तो सुब कुछ रेडीमेड हो गया है..
    शेखावाटी में तो भूजल भी अपने अंतिम दौर में चल रहा है :(
    जो भी है भविष्य के गर्भ में है...अपने पास दुःख व्यक्त करने के अलावा शायद ही कुछ है
    अगर कुछ है तो एक छोटी सी बहस और फिर शांत.............जो होगा देखा जाएगा !!

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  8. पता नहीं इस मौसम के बदलाव का असर है या कुछ और, पर उत्तरप्रदेश में दलहन पर बुरा असर है।

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  9. fgggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggggg

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  10. vikram singh chouhan17 May 2010 3:57 PM

    very good naresh ji

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  11. ग्लोबल वार्मिंग के चलते पिछले कुछ सालों से गुजरात में भी केरी दिसम्बर जनवरी में आने लगी है।

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