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Saturday, November 5, 2011

पहली हवाई यात्रा,शारजहा ,दुबई ,अफगानिस्तान part-2

पिछली पोस्ट में आपने पढ़ लिया की भारत से जाने वाले लोगो को कैसी कैसी समस्याए झेलनी पड़ती है | अब आते है शोषण की बात पर यंहा शारजाह में जिस एजेंट के पास हमें भेजा गया था वो इसाई धर्म का था | शारजाह में जो चर्च है वो हमारे रहने के स्थान से लगभग तीन चार किमी था | वंहा उसने कह रखा था की आप सबको प्रत्येक मंगलवार को चर्च में जाना है | चर्च काफी बड़ा है उसमे अलग अलग भाषा के लोगो के लिए अलग अलग वातनुकुलित हाल  बने हुए है | हम लोग हिन्दी भाषा के हाल में बैठते थे | वंहा एक महाशय अच्छा मुजिक बजाते थे | हम लोग उनके सुर में सुर मिलते थे | जो वो बोलने के लिए कहते हम उनकी आज्ञा  का पालन शिष्य की तरह करते थे | मुझे किसी भी धर्म से कोइ शिकायत नहीं है और ना ही किसी धर्म को मै छोटा बड़ा मानता हूँ |
लेकिन धार्मिक आस्था सब का मौलिक अधिकार है और किसी भी धर्म में आस्था रखना उसका निजी स्वतंत्रता का मामला है ना की किसी दबाव का ,वंहा वे सभी को इसाई धर्म के अनुयायी बनने पर जोर देते थे हम भी बिना इच्छा के जो वे बोलने के लिए कहते थे वही बोलते थे | वे कहते थे की कोइ भी ईशु से बड़ा नहीं है आप हमेशा ईशु को याद करो | जो वंहा नहीं जाता था उसको एजेंट महाशय लताड़ पिलाते थे | वापस इंडिया भेजने की बात करते थे |

अब एक रोचक वाकया बताता हूँ वैसे बताने को बहुत कुछ है लेकिन अगर नेट पर समय ज्यादा मिला तो विस्तार से बताऊंगा | नहीं तो फिर कभी देखेंगे | शारजहा में रूपये ख़तम हो गए थे दाल चावल खा खा कर उकता अगये थे | एक दिन शुक्रवार के दिन देखा की कुछ लोग सामान बाँट रहे है | जैसे दाल चावल चीनी चाय ,रेडी फ़ूड के पैकेट जैसे चिकन ,टूना मछली  | भारत और बंगलादेशी लोग लाइन में खड़े थे लेने के लिए | हमने भी उस लाइन में लगने का निर्णय किया ,एक बार तो दिल ने कहा की आज तक जब इस प्रकार भिखारी की तरह लाइन में नहीं लगे तो आज क्यों ? और रहा सहा ब्लोगरो वाला स्वाभिमान आड़े आ  रहा था | लेकिन फिर दिमाग पर जोर दिया थोड़े व्यवहारिक हुए और लाइन में लग गए खड़े खड़े सोचने लगे की इस ट्रस्ट को,जो इसकी व्यवस्था कर रहा है उसे बाद में पैसे भिजवा देंगे ज्यादा से ज्यादा इनका सामान दो सो चार सो रूपये का होगा सो कभी भी इनको सहायता राशी भेजी जा सकती है |  मेरा नंबर आया तब मैंने सामान ले लिया आप तो जानते ही है की मै शाकाहारी हूँ लेकिन जो मिला था वो सब मांसाहारी था सो बाद में शाकाहारी भोजन प्राप्त  कर चुके भाई की खोज कर एक्सचेंज कर लिया और मजे से उस भोज का स्वाद लिया | लेकिन बाद में उन लोग को मैंने नाम पता पूछा तो उन लोगो ने बताने से इनकार कर दिया कहा की उन लोगो को इससे समस्या हो सकती है | हम लोग पोपुलरटी  नहीं चाहते है इस लिए नाम पता नहीं बताएँगे | खैर कोइ बात नहीं है उनको तो हम ढूंढ ही लेंगे  |

मेरे आगे की यात्रा के बारे आप अगली पोस्ट में पढ़ पायंगे की मैंने कैसे हेलिकोप्टर वाले को बेवकूफ बनाया साथ बने रहीये |

11 comments:

  1. अगली कड़ी का इंतजार ...........

    फोन वाली वेब साईट में बैलेंस खत्म होने से पहले मेल कर दीजियेगा|

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  2. पहली बार सच्चाई पता चल रही है।

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  3. नरेश जी आपका दर्द मैं समझ सकता हूँ ....बस इस उमिद्द के साथ कि आप जैसे बाहर रहने वाले लोगो ...का जो इण्डिया के हैं उनका पूरा साथ चाहिय ...आप पूरा सहयोग करें व्येव्स्था परिवर्तन में ...बस आने वाले समय में भर कि आर्थिक रूप से समृद्ध बना देंगे ताकि किसी को भी बाहर जाने कि जरूरत नहीं पड़े ...बस अर्थक्रान्ति क स्पोट किजीय ...

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  4. ईसाइयों के तो न जाने कितने ऐसे ही काम है, बस लोग ही अंधे होकर इन्‍हें पहचान नहीं पाते हैं।

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  5. बताइये हम भी पढ़ रहे हैं।

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  6. naresh ji,
    Insaan parishthitiyon ka gulaam hota hai....

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  7. आपके साथ हैं हम भी...... शुभकामनायें

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  8. ज्ञानवर्द्धन हो रहा है .. बने रहेंगे आपके साथ !!

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  9. साथ क्या, मैं तो आपके ब्लॉग पर ही टकटकी लगाये बैठा रहता हूँ।

    प्रणाम

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  10. बहुत ही रोचक यात्रा वृतांत

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