काफी दिनों से कुछ अलग लिखने की कोशिश कर रहा था | लेकिन कुछ मसाला इन दिनों में नहीं सूझ रहा था | राजस्थानी में कहावत है की गोद में छोरा गांव में ढिंढोरा | सही कहा गया है | हमारे पास में ही एक गांव है , बख्तावरपुरा | यह गांव जिला मुख्यालय झुंझुनू से २० किमी तथा तहसील मुख्यालय से १० किमी दूरी पर है | इसकी स्थिति जयपुर पिलानी रोड पर होने की वजह से यातायात के साधन पर्याप्त है |

"बख्तावर" का फारसी में अर्थ होता है भाग्यशाली | खेतड़ी के राजा बख्तावर सिंह जी के नाम पर इसका नाम बख्तावरपुरा रखा गया था | यहां का मुख्य व्यवसाय खेती और पशुधन है | कुछ साल पहले गांव में जगह जगह कूड़े कचरे के ढेर लगे हुए थे | रास्तों में कीचड़ और पानी घुटनों तक भरा रहता था आम आदमी का वहा से गुजरना बहुत ही टेढा काम था | गन्दगी से मच्छर और मलेरिया का प्रकोप बना ही रहता था | लेकिन गांव में सेवा भावी व्यक्ति ( वर्तमान सरपंच ) श्री महेन्द्र जी कटेवा की दृढ़ इच्छा शक्ति व दूरदर्शी सोच के कारण आज हालात बदले हुए है |
जब मै इस गांव मे पहुंचा तो मैंने पाया कि इसे गांव कहना ही गलत होगा । क्यों कि जन साधारण के मनो मस्तिष्क में तो गाँव कि तस्वीर में सुविधाओ को तरसते ग्रामिण और गन्दगी से अटे पड़े गलियारे ही होते है । पर यहाँ कि बात बिल्कुल उलट है

बस स्टैंड पर यात्रीयो के लिये बड़ा सा टिन शैड बना हुआ है । जिसमे बैठने के लिये कुर्सियो की, हवा के लिये पंखों की, पीने के पानी के लिये वाटर कूलर की , और सार्वजनिक शौचालयों कि व्यवस्था है । बस स्टैंड के पास ही ग्राम पंचायत का कार्यालय बना हुआ है । जिसे मिनि सचिवालय का नाम दिया गया है इसमें ग्राम सहायक, पटवारी, सरपंच आदि के पृथक पृथक कार्यालय बने हुये है । बाहर बड़ा बरामदा बना हुआ है जिसमे 10-15 कुर्सियां रखी गयी है । हवा के लिये पंखों कि सुविधा है । वहाँ आया हुआ अतिथि या ग्रामीण सुकून से आराम कर सकता है । यहाँ पर महीने में दो बार सभी सरकारी व गैर सरकारी लोगों की मीटिंग होती है जिसमे स्कूल के अध्यापक, अस्पताल के कर्मचारी ,ग्राम सेवक, पटवारी सरपंच व अन्य एन जी ओ वग़ैरा मौजूद रह कर ग्रामीण की समस्याओं का निदान करते है ।


( गांव का जल संग्रहण एंव जल कूप पुनर्भरण ( harvesting and water conservation plan आदि अन्य बाते अगले भाग मे )- _
वाह नरेश जी, बख्तावरपुरा के बारे में पढ़कर मुझे उस गांव की याद ताज़ा हो गई, जहां मेरे बचपन का कुछ वक्त बीता था। गांवों को इस तरह इंटरनेट पर जोड़कर आप राजस्थानी संस्कृति को एक नायाब तोहफा दे रहे हैं.. हैपी ब्लॉगिंग
ReplyDeleteबख्तावरपुरा के बारे में जानकर बहुत बढिया लगा. काश इससे प्रेरणा पाकर अन्य गांव भी ऐसे ही विकासोन्मुख कदम ऊठा सकें. बहुत शुभकामनाए. इस गांव के बारे मे जानने की और उत्सुकता रहेगी. जैसे किसकी प्रेरणा से और किनके प्रयत्नों से यह विकास संभव हुआ?
ReplyDeleteरामराम.
ताऊ ने सही कहा -" काश इससे प्रेरणा पाकर अन्य गांव भी ऐसे ही विकासोन्मुख कदम ऊठा सकें" |
ReplyDeleteनरेश जी आपने इस गांव की जानकारी देकर बहुत बढ़िया किया . हमें पता तो चले कि हम गांव का कहाँ तक और कैसे विकास कर सकते है | आपके साथ ही गांव के सरपंच जी का बहुत बहुत आभार |
प्रशंसनीय कार्य।
ReplyDelete( Treasurer-S. T. )
काश!सभी गाँव ऐसे ही हो जाएँ।
ReplyDeleteबख्तावरपुर, जाना चाहिए. ऐसी सुविधाएं तो महानगरों में भी नहीं मिलती.
ReplyDeleteबहुत अच्छा लेखन है.
ReplyDeleteप्रयास सफ़ल हो तो ख़ुशी सभी को होती है
ReplyDeleteयह किसी चमत्कार से कम नहीं।
ReplyDelete{ Treasurer-S, T }
"बख्तावर" का फारसी में अर्थ होता है भाग्यशाली"
ReplyDeleteयानि कि ये गाँव अपने नाम को सार्थक करता जा रहा है!!!लेकिन भाग्य के साथ ही इस गाँव के लोगों के अपने प्रयासों का भी इसमें योगदान दिखाई दे रहा है!!