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Wednesday, September 15, 2010

तीन लघु कविताएं - नरेश अग्रवाल के कविता संग्रह से

श्री नरेश अग्रवाल मूलतः हमारे गृह जिले झुंझुनूं(राज.) के रहने वाले है लेकिन अब वे जमशेद पुर बिहार में रहते है | इनका  काव्य से बहुत प्रेम है इन्होने बहुत सी किताबे लिखी है | मै यहां आपको उनका पूरा परिचय नहीं दे रहा हूँ | पूरी जानकारी आप उनकी वेबसाईट     http://www.nareshagarwala.com/पर जाकर देख सकते है | मेरे आग्रह पर उन्होने मुझे कुछ कविताएं इस ब्लॉग पर छापने की अनुमति दी है | जिसके लिये मै नरेश अग्रवाल जी का आभारी हूँ | आपको कविताये अगर पसंद आयी तो आगे और भी कविताएं आपके लिये यहां लाऊंगा |


       पगडंडी

जहां से सडक़ खत्म होती है
वहां से शुरू होता है
यह संकरा रास्ता
बना है जो कई वर्षों में
पॉंवों की ठोकरें खाने के बाद,
इस पर घास नहीं उगती
न ही होते हैं लैम्पपोस्ट
सिर्फ भरी होती है खुशियॉं
लोगों के घर लौटने की !


कैसे चुका पायेंगे तुम्हारा          ऋण




रात जिसने दिखाये थे
हमें  सुनहरे सपने
किसी अजनबी प्रदेश के
कैसे लौटा पायेंगे
उसकी स्वर्णिम रोशनी


कैसे लौटा पायेंगे
चांद- सूरज को उनकी चमक
समय की बीती हुई उम्र
फूलों को खुशबू
झरनों को पानी और
लोगों को उनका  प्यार


कैसे लौटा पायेंगे
खेतों को फसल
मिट्टी को स्वाद
पौधों को उनके फल


ए धरती तुम्हीं बता
कैसे चुका पायेंगे
तुम्हारा इतना सारा ऋण ।



यह लालटेन



सभी सोये हुए हैं
केवल जाग रही है
एक छोटी-सी लालटेन
रत्ती भर है प्रकाश जिसका
घर में पड़े अनाज जितना
बचाने के लिए जिसे
पहरा दे रही है यह
रातभर ।



राजस्थान के लोक देवता
पहेली से परेशान राजा और बुद्धिमान ताऊ
माली गाँव :मन मोहक नजारा गणेशोत्सव की झांकी का